ऐसा क्यों होता है कि कभी कभी हमें बहुत सारे विचार हमारे मन तो उद्वेलित कर देतें हैं और जब लिखने को बैठो तो हमे शून्यता के सिवाय कुछ भी नहीं मिलता है? यही हो रहा है आज मुझको। जब मैंने इस ब्लॉग के लिए साइन अप किया था तब मैं कई सारी बड़ी बड़ी बातों को सोच रहा था पर आज तीसरे ही दिन सारा का सारा जोश ठंडा पड़ गया। यह बिल्कुल ध्यान की ही तरह है जब हमें अपने दिमाग को विचार शून्य करना होता है तभी हमें विचारों की एक अनंत धारा मिलती जाती है और हम उन विचारों की धारा में प्रवाह करना शुरू कर देते हैं और बिल्कुल भूल ही जातें हैं कि करने क्या बैठें हैं और बार बार याद आने पर हम अपने दिमाग को ध्यान की अवस्था में ले जाने कोशिश करते रहते हैं। लेखन वास्तव में कुछ भी नहीं और बहुत कुछ भी है। मेरा यहां पर लिखना कुछ भी नहीं और जिन लोगों का लिखा मैं पढ़ रहा उनका वही लिखा हुआ मेरे लिए बहुत कुछ है। धन्यवाद्!
आज मैं बात करूंगा शिक्षा व्यवस्था की। इस बात से तो सभी सरोकार रखतें है की शिक्षा और स्वास्थ्य के मामले में अभी भी भारत को बहुत काम करना है। शिक्षा व्यवस्था का आलम यह है कि जहां सरकारी विद्यालय में शिक्षक भी हैं वह पढ़ाने में कोई विश्वाश ही नहीं रखते हैं। मै भी भावी शिक्षक बनने की दिशा में कार्यरत हूं। पर मुझे अपनी ट्रेनिंग के दौरान जो देखने को मिल रहा है उसे देखकर लगता है जो भी ही रहा है मात्र एक दिखावा है ना ही कोई पढ़ना चाहता है और ना ही कोई पढ़ाना चाहता है। इससे हो क्या रहा है हमें लगता है कुछ नहीं। यही गलत फहमी तो पाल के हम बैठें है हाथ पर हाथ रखे। हमें यह पूरी तस्वीर तो दिख ही नहीं रही। अपने समय को बिताने के उद्देश्य से अध्यापक आतें हैं कोई कथा वाचन करतें हैं और चले जातें हैं। अभी मै संस्थान में ही बैठा हूं समय बर्बाद करते हुए। ना ही कोई पढ़ाने वाला है बस सारा ध्यान इस ओर है कि बस किसी भी तरीके से उपस्तिथि इस लायक रहें कि हम सभी परीक्षा में बैठ सकें। अब जब हमारी ट्रेनिंग ही इस तरह से हो रही तो हम आगे क्या करने वालें है यह एक स्वस्थ दिमाग वाला मनुष्य सोच सकता है। केवल और केवल स...