ऐसा क्यों होता है कि कभी कभी हमें बहुत सारे विचार हमारे मन तो उद्वेलित कर देतें हैं और जब लिखने को बैठो तो हमे शून्यता के सिवाय कुछ भी नहीं मिलता है? यही हो रहा है आज मुझको। जब मैंने इस ब्लॉग के लिए साइन अप किया था तब मैं कई सारी बड़ी बड़ी बातों को सोच रहा था पर आज तीसरे ही दिन सारा का सारा जोश ठंडा पड़ गया। यह बिल्कुल ध्यान की ही तरह है जब हमें अपने दिमाग को विचार शून्य करना होता है तभी हमें विचारों की एक अनंत धारा मिलती जाती है और हम उन विचारों की धारा में प्रवाह करना शुरू कर देते हैं और बिल्कुल भूल ही जातें हैं कि करने क्या बैठें हैं और बार बार याद आने पर हम अपने दिमाग को ध्यान की अवस्था में ले जाने कोशिश करते रहते हैं। लेखन वास्तव में कुछ भी नहीं और बहुत कुछ भी है। मेरा यहां पर लिखना कुछ भी नहीं और जिन लोगों का लिखा मैं पढ़ रहा उनका वही लिखा हुआ मेरे लिए बहुत कुछ है। धन्यवाद्!